नवरात्रि का नौवां दिन: रोचक तथ्य और 2024 के लिए पूजा का मुहूर्त

परिचय

नवरात्रि का पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस पर्व में कुल नौ दिन होते हैं, जिनमें माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के अंतिम दिन, जिसे नवमी कहा जाता है, माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यह दिन विशेष रूप से माता के भक्तों के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस लेख में, हम नवरात्रि के नौवें दिन के बारे में रोचक तथ्य और 2024 में पूजा के लिए मुहूर्त पर चर्चा करेंगे। 

नवरात्रि का नौवां दिन: माँ सिद्धिदात्री

माँ सिद्धिदात्री का स्वरूप

माँ सिद्धिदात्री का स्वरूप अत्यंत दिव्य और भव्य है। वह सभी प्रकार की सिद्धियों और ज्ञान की दात्री मानी जाती हैं। माँ का यह स्वरूप साधकों को मानसिक शक्ति, आध्यात्मिक ज्ञान और सफलता प्रदान करता है। उनके चार हाथ होते हैं, जिनमें शंख, चक्र, गदा और कमल होता है। माँ सिद्धिदात्री की पूजा करने से भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और जीवन में हर तरह की समस्या का समाधान होता है।

2024 में दुर्गा नवमी का मुहूर्त

2024 में दुर्गा नवमी का पर्व 11 अक्टूबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन की पूजा का मुहूर्त निम्नलिखित है:

– अभिजीत मुहूर्त: 11:45 AM से 12:30 PM

– विजय मुहूर्त: 02:15 PM से 03:00 PM

इस दौरान पूजा करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। 

नवरात्रि के नौवें दिन के रोचक तथ्य

1. नवमी का पर्व:

   – नवमी का पर्व माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने के लिए मनाया जाता है। इसे विजयादशमी की तैयारी का दिन भी माना जाता है।

2. कन्या पूजन:

   – इस दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व है। भक्त नौ कन्याओं का पूजन करते हैं, जो माँ दुर्गा के रूप मानी जाती हैं। उन्हें भोग और उपहार देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

3. सिद्धियाँ प्राप्त करने का दिन:

   – नवमी का दिन साधकों के लिए विशेष है, क्योंकि इस दिन माँ सिद्धिदात्री भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। साधक विशेष साधना और मंत्र जप करते हैं।

4. ध्यान और साधना:

   – इस दिन भक्तों को ध्यान और साधना करने की विशेष सलाह दी जाती है। ध्यान करने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक विकास होता है।

5. आध्यात्मिकता का संदेश:

   – नवमी का पर्व आध्यात्मिकता और सकारात्मकता का संदेश देता है। इस दिन भक्तों को नकारात्मकता से दूर रहकर अपने मन को शुद्ध करना चाहिए।

6. विशेष अनुष्ठान:

   – इस दिन कई भक्त विशेष अनुष्ठान करते हैं, जैसे हवन, यज्ञ आदि। इससे वातावरण शुद्ध होता है और माँ का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

7. भक्तों का एकत्र होना:

   – नवमी के दिन भक्त एकत्र होकर सामूहिक पूजा करते हैं। यह एकता और भाईचारे का प्रतीक है।

8. माँ के भोग:

   – नवमी के दिन विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं। भक्त माँ को विभिन्न मिठाइयाँ, फल और खास पकवान अर्पित करते हैं।

9. पूजा सामग्री:

   – इस दिन पूजा के लिए विशेष सामग्री की आवश्यकता होती है, जैसे फूल, फल, मिठाई, दीपक, आदि। पूजा के लिए ये सभी सामग्री स्वच्छ और पवित्र होनी चाहिए।

10. रक्षा बंधन:

    – इस दिन को कुछ स्थानों पर रक्षा बंधन का पर्व भी मनाया जाता है, जहाँ भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं।

नवमी के दिन के अनुष्ठान

दुर्गा नवमी के दिन भक्तों द्वारा निम्नलिखित अनुष्ठान किए जाते हैं:

1. स्नान और शुद्धता:

   – इस दिन स्नान करना आवश्यक है। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा करना चाहिए।

2. पूजा स्थान की तैयारी:

   – पूजा के लिए एक स्वच्छ स्थान निर्धारित करें और वहां देवी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।

3. कन्या पूजन:

   – नौ कन्याओं का पूजन करें। उन्हें भोजन कराएं और उपहार दें। यह अनुष्ठान माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है।

4. मंत्र जाप:

   – “ॐ सिद्धिदात्र्यै नमः” और “ॐ दुं दुर्गायै नमः” का जाप करें। इन मंत्रों का जाप करने से देवी की कृपा प्राप्त होती है।

5. आरती और भोग:

   – पूजा के अंत में माँ की आरती करें और उन्हें भोग अर्पित करें। यह भोग भक्तों के लिए प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

6. हवन या यज्ञ:

   – यदि संभव हो, तो हवन या यज्ञ का आयोजन करें। इससे वातावरण शुद्ध होता है और माँ की कृपा प्राप्त होती है।

नवमी के दिन का महत्व

दुर्गा नवमी का पर्व शक्ति, साहस, और सकारात्मकता का प्रतीक है। यह दिन भक्तों के लिए सभी प्रकार की सिद्धियों और आशीर्वाद की प्राप्ति का दिन है। इस दिन की पूजा से भक्तों को मानसिक शांति, सुख, और समृद्धि मिलती है। इसके साथ ही, नवमी का पर्व भाईचारे, प्रेम और एकता का संदेश देता है।

निष्कर्ष

दुर्गा नवमी का पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा से भक्तों को मानसिक शक्ति, आध्यात्मिक ज्ञान और सफलता प्राप्त होती है। 2024 में, नवमी का पर्व 11 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन पूजा का सही मुहूर्त और अनुष्ठान करने से माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है। 

उम्मीद है कि इस लेख से आपको नवरात्रि के नौवें दिन की विशेषताओं और पूजा विधियों के बारे में अच्छी जानकारी मिली होगी। माँ दुर्गा की कृपा आप सभी पर सदा बनी रहे।

दुर्गा अष्टमी पूजा: क्या करें और क्या न करें

परिचय

दुर्गा अष्टमी, नवरात्रि के आठवें दिन मनाई जाती है और यह हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन देवी दुर्गा के महागौरी रूप की पूजा की जाती है। दुर्गा अष्टमी का पर्व भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह दिन शक्ति और नारीत्व का प्रतीक है। इस दिन की पूजा विधि और अनुष्ठान भक्तों के लिए अत्यधिक फलदायी माने जाते हैं। इस लेख में हम जानेंगे कि दुर्गा अष्टमी के दिन क्या करें और क्या न करें।

दुर्गा अष्टमी का महत्व

दुर्गा अष्टमी का महत्व न केवल धार्मिक दृष्टि से है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस दिन देवी दुर्गा की पूजा से भक्तों को शक्ति, साहस और समृद्धि की प्राप्ति होती है। अष्टमी को ही माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था, जो बुराई और अन्याय का प्रतीक था। इस दिन माँ दुर्गा के प्रति भक्ति और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए भक्त विशेष अनुष्ठान करते हैं।

दुर्गा अष्टमी के दिन क्या करें

1. स्नान और शुद्धता

दुर्गा अष्टमी के दिन पूजा से पहले स्नान करना बहुत आवश्यक है। स्नान करने से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें, जिससे पूजा का वातावरण पवित्र बन सके। 

2. पूजा स्थान की तैयारी

पूजा के लिए एक स्वच्छ और पवित्र स्थान का चयन करें। वहां देवी दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर रखें। पूजा स्थान को फूलों और दीपों से सजाएं।

3. फूल और भोग अर्पित करें

माँ दुर्गा को फूल, खासकर लाल या सफेद फूल अर्पित करें। इसके अलावा, उन्हें मीठे चावल, फल, या अन्य भोग भी अर्पित करें। 

4. मंत्र जाप

दुर्गा अष्टमी के दिन निम्नलिखित मंत्रों का जाप करें:

– दुर्गा सप्तशती: “ॐ दुं दुर्गायै नमः”

– कात्यायनी मंत्र: “ॐ कात्यायन्यै नमः”

इन मंत्रों का जाप करने से माता की कृपा प्राप्त होती है और भक्त को मानसिक शांति मिलती है।

5. कन्या पूजन

दुर्गा अष्टमी का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान कन्या पूजन है। इस दिन नौ कन्याओं (या आठ) का पूजन किया जाता है। उन्हें भोजन कराएं और उन्हें उपहार दें। कन्याओं का पूजन करने से माँ दुर्गा की विशेष कृपा मिलती है।

6. आवश्यक सामग्रियों की व्यवस्था

दुर्गा अष्टमी पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्रियों की व्यवस्था करें:

– दीपक (बत्ती)

– फूल (लाल या सफेद)

– फल (केला, सेब, नारियल)

– मिठाई (लड्डू, peda)

– चावल और दाल

– हवन सामग्री (अगर हवन कर रहे हों)

7. आरती और स्तुति

पूजा के अंत में देवी की आरती करें। आरती करते समय श्रद्धा से ध्यान लगाएं और मन से प्रार्थना करें। इसके बाद भक्तों को प्रसाद वितरित करें।

8. दान-पुण्य करें

इस दिन दान करना भी बहुत शुभ होता है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या पैसे दान करें। इससे माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और पुण्य का संचय होता है।

दुर्गा अष्टमी के दिन क्या न करें

1. अशुद्धता

दुर्गा अष्टमी के दिन अशुद्धता से बचें। पूजा के दौरान ध्यान रखें कि कोई भी अशुद्ध वस्तु या विचार पूजा स्थल पर न आएं।

2. मांस और शराब

इस दिन मांस, शराब या किसी भी प्रकार के नशे का सेवन न करें। यह पूजा की पवित्रता के खिलाफ है।

3. द्वेष और नफरत

दुर्गा अष्टमी के दिन द्वेष और नफरत से बचें। सभी प्राणियों के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव रखें। 

4. खराब या बेकार चीजें

माँ दुर्गा के समक्ष बेकार या खराब चीजें न रखें। केवल शुद्ध और सुगंधित चीजें ही अर्पित करें।

5. उच्च आवाज में बात करना

पूजा के समय ऊँची आवाज में बात करने से बचें। पूजा का माहौल शांत और पवित्र रखें।

6. असत्य बोलना

पूजा के दिन असत्य बोलने से बचें। सत्य बोलना और सच्चाई के मार्ग पर चलना आवश्यक है।

दुर्गा अष्टमी पूजा की विशेष विधि

दुर्गा अष्टमी की पूजा में निम्नलिखित विधियों का पालन करना चाहिए:

  1. गृह देवता का पूजन:

   – पहले अपने गृह देवता का पूजन करें, फिर देवी दुर्गा का पूजन करें।

2. स्नान के बाद व्रत का संकल्प: 

   – स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें और उपवास रखने का मन बनाएं।

3. हवन का आयोजन:

   – यदि संभव हो, तो हवन का आयोजन करें। इससे वातावरण शुद्ध होता है और देवी की कृपा प्राप्त होती है।

4. संध्या में पूजा:

   – संध्या के समय पूजा का आयोजन करें। संध्या समय देवी की पूजा विशेष फलदायी होती है।

5. शुभ मुहूर्त:

   – पूजा के लिए शुभ मुहूर्त का ध्यान रखें। इस दिन का अभिजीत मुहूर्त विशेष महत्व रखता है।

दुर्गा अष्टमी से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

दुर्गा अष्टमी से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ हैं। इनमें से एक प्रसिद्ध कथा है:

महिषासुर का वध:

एक समय एक शक्तिशाली असुर महिषासुर ने ब्रह्मा, विष्णु और शिव से वरदान प्राप्त किया था कि कोई भी पुरुष उसे नहीं मार सकता। इससे उसने देवताओं और मानवों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। देवताओं ने देवी दुर्गा की आराधना की और उन्हें महिषासुर का वध करने के लिए उत्पन्न किया। देवी ने अपनी शक्तियों के साथ महिषासुर से युद्ध किया और उसे पराजित कर दिया। इस विजय के प्रतीक के रूप में दुर्गा अष्टमी मनाई जाती है।

दुर्गा अष्टमी का आध्यात्मिक महत्त्व

दुर्गा अष्टमी केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिकता का भी प्रतीक है। इस दिन भक्त अपनी आत्मा को शुद्ध करने और आत्मिक शक्ति प्राप्त करने के लिए विभिन्न साधनाएँ करते हैं। यह दिन भक्ति, प्रेम, और एकता का संदेश देता है। 

निष्कर्ष

दुर्गा अष्टमी का पर्व भक्तों के लिए शक्ति, साहस और सकारात्मकता का संचार करता है। इस दिन देवी दुर्गा की पूजा करने से भक्तों को सभी प्रकार के कष्टों और भय से मुक्ति मिलती है। पूजा विधियों का पालन करके और नकारात्मकता से दूर रहकर, आप माता के आशीर्वाद से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं। इस पावन अवसर पर, सभी भक्तों को माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त हो, यही शुभकामना।

नवरात्रि 2024 का सातवां दिन: इतिहास, विशेषता, महत्त्व और पूजा का शुभ मुहूर्त

परिचय:

नवरात्रि हिन्दू धर्म का एक अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण पर्व है, जो पूरे भारत में बड़े उल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ विभिन्न रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। इन नौ रूपों में हर देवी का विशेष महत्त्व होता है, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं और साधकों की आध्यात्मिक उन्नति से संबंधित होते हैं। 2024 में नवरात्रि का सातवां दिन 12 अक्टूबर को पड़ रहा है, और इस दिन की पूजा देवी कालरात्रि को समर्पित होती है। 

देवी कालरात्रि का स्वरूप, उनकी पूजा का महत्त्व, इस दिन के आध्यात्मिक और ऐतिहासिक पहलू, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त—इन सबका गहन विवेचन इस लेख में किया जाएगा। देवी कालरात्रि की पूजा से साधकों को भय, कष्ट, और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है। यह दिन उन साधकों के लिए विशेष होता है, जो आत्मिक उन्नति और मानसिक शांति की प्राप्ति के लिए प्रयासरत होते हैं।

नवरात्रि के सातवें दिन का इतिहास और पौराणिक कथा

नवरात्रि के सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है। देवी कालरात्रि का उल्लेख पुराणों में देवी दुर्गा के विकराल रूप के रूप में किया गया है। उन्हें महाकाली या श्यामाकाली के नाम से भी जाना जाता है। कालरात्रि शब्द का अर्थ है “रात्रि की देवी” या “काली रात्रि”, जो अज्ञानता और अंधकार को नष्ट करने वाली देवी मानी जाती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी कालरात्रि ने असुरों और दैत्यों का संहार कर धर्म की स्थापना की थी। उनका स्वरूप अत्यंत विकराल और रौद्र रूप लिए हुए है, जो यह दर्शाता है कि जब संसार में अधर्म और अन्याय का बोलबाला होता है, तब देवी कालरात्रि अपनी उग्र शक्ति से उनका नाश करती हैं।

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, देवी कालरात्रि ने रक्तबीज नामक असुर का वध किया था। रक्तबीज की यह विशेषता थी कि जब भी उसका रक्त धरती पर गिरता, तो उससे हजारों रक्तबीज उत्पन्न हो जाते थे। ऐसे में देवी दुर्गा ने कालरात्रि का रूप धारण कर रक्तबीज का संहार किया। देवी कालरात्रि ने रक्तबीज का रक्त पी लिया ताकि उसके रक्त से और असुर उत्पन्न न हो सकें। इस प्रकार देवी ने अधर्म और असुरता का अंत कर धर्म की स्थापना की।

देवी कालरात्रि के इस विकराल रूप से यह संदेश मिलता है कि संसार में चाहे कितनी भी अंधकारमयी स्थिति क्यों न हो, ज्ञान और शक्ति से उस अंधकार का नाश किया जा सकता है। कालरात्रि का रूप साधकों को यह प्रेरणा देता है कि वे अपने जीवन में किसी भी प्रकार की नकारात्मकता और भय को अपने आत्मबल से समाप्त कर सकते हैं।

देवी कालरात्रि का स्वरूप

देवी कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत भयानक और रौद्र होता है, जो अज्ञानता और अंधकार को नष्ट करने का प्रतीक है। उनका वर्ण काला है और उनके चार हाथ होते हैं। उनके एक हाथ में खड्ग (तलवार) और दूसरे हाथ में लौह अस्त्र है, जबकि अन्य दो हाथ अभय और वरदान की मुद्रा में होते हैं। उनके तीन नेत्र होते हैं, जो सूर्य, चंद्र और अग्नि के समान तेजस्वी हैं। उनकी श्वास से अग्नि की ज्वालाएँ निकलती हैं और उनका वाहन गधा है, जो विनम्रता और धैर्य का प्रतीक है। 

देवी कालरात्रि का यह रूप भले ही भयानक हो, लेकिन यह हमें यह सिखाता है कि जीवन में किसी भी प्रकार का डर या भय केवल अज्ञानता का परिणाम होता है, और जब हम ज्ञान और शक्ति के साथ उस भय का सामना करते हैं, तब वह नष्ट हो जाता है। उनकी पूजा से साधक को आंतरिक शक्ति और साहस की प्राप्ति होती है, जिससे वह जीवन के सभी कठिन समय को पार कर सकता है।

देवी कालरात्रि का महत्त्व

देवी कालरात्रि का मुख्य उद्देश्य भक्तों को नकारात्मक ऊर्जा, भय, कष्ट और अवरोधों से मुक्ति दिलाना है। उनकी पूजा से साधक को मानसिक और आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है, जिससे वह अपने जीवन के सभी संघर्षों का सामना धैर्य और साहस के साथ कर सकता है। 

नवरात्रि के सातवें दिन की पूजा का विशेष महत्त्व है, क्योंकि यह दिन साधकों के लिए भय से मुक्ति और आत्मिक उन्नति का प्रतीक है। देवी कालरात्रि की पूजा करने से भक्तों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वे मानसिक रूप से सशक्त महसूस करते हैं। विशेष रूप से इस दिन की पूजा उन भक्तों के लिए फलदायी मानी जाती है, जो जीवन में मानसिक तनाव, भय, या किसी भी प्रकार की नकारात्मकता से जूझ रहे होते हैं।

देवी कालरात्रि की पूजा से साधक को आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है, जिससे वह अपनी इच्छाशक्ति को मजबूत कर अपने जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति कर सकता है। यह दिन साधक को आंतरिक शांति और आत्मविश्वास की प्राप्ति का अवसर प्रदान करता है।

नवरात्रि के सातवें दिन का आध्यात्मिक महत्त्व

नवरात्रि के सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा का आध्यात्मिक महत्त्व अत्यंत गहरा है। इस दिन साधक अपने भीतर की अज्ञानता और भय को समाप्त कर आत्मज्ञान की प्राप्ति कर सकता है। देवी कालरात्रि का संबंध हमारे मस्तिष्क के “सहस्रार चक्र” से माना जाता है, जो सातवां और सबसे ऊंचा चक्र है। यह चक्र आत्मज्ञान, आत्मिक जागरूकता, और ब्रह्मांडीय चेतना का केंद्र है।

सहस्रार चक्र के जागृत होने से साधक को ब्रह्मांडीय ऊर्जा का अनुभव होता है, जिससे उसे आत्मज्ञान और आध्यात्मिक स्वतंत्रता की प्राप्ति होती है। देवी कालरात्रि की पूजा करने से साधक का यह चक्र संतुलित होता है और वह अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने में सक्षम होता है। 

पूजा विधि और अनुष्ठान

नवरात्रि के सातवें दिन की पूजा विधि और अनुष्ठान अन्य दिनों की पूजा विधि से थोड़े भिन्न होते हैं। इस दिन विशेष रूप से देवी कालरात्रि की आराधना के लिए कुछ अनुष्ठानों का पालन किया जाता है, जिससे साधक को विशेष फल की प्राप्ति होती है। 

1. स्नान और शुद्धिकरण: इस दिन की पूजा करने से पहले स्नान करना और अपने शरीर और मन को शुद्ध करना अत्यंत आवश्यक है। इसके बाद पूजा स्थल की शुद्धि के लिए गंगाजल का छिड़काव किया जाता है।

2. दीप प्रज्वलन: देवी कालरात्रि के समक्ष एक दीपक प्रज्वलित किया जाता है, जो देवी के तेज और प्रकाश का प्रतीक होता है।

3. मंत्र जाप: देवी कालरात्रि की पूजा में विशेष मंत्रों का जाप करना अत्यंत फलदायी होता है। उनका प्रमुख मंत्र है:

   “`

   ॐ कालरात्र्यै नमः।

   “`

   इस मंत्र का जाप साधक को देवी की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने में सहायक होता है।

4. फूल और फल अर्पित करना: देवी कालरात्रि को लाल रंग के फूल विशेष प्रिय होते हैं, इसलिए इस दिन की पूजा में लाल फूल अर्पित करना चाहिए। इसके अलावा, देवी को गुड़ का भोग लगाना शुभ माना जाता है।

5. आरती और स्तुति: पूजा के अंत में देवी की आरती की जाती है और उनके समक्ष दीप प्रज्वलित कर स्तुति की जाती है। इस समय भक्त देवी से जीवन में शांति, समृद्धि और भय से मुक्ति की कामना करते हैं।

6. प्रसाद वितरण: आरती के बाद देवी को अर्पित किए गए प्रसाद को सभी भक्तों में वितरित किया जाता है। 

पूजा का शुभ मुहूर्त (2024)

2024 में नवरात्रि के सातवें दिन की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार है:

– अभिजीत मुहूर्त: 11:45 AM से 12:30 PM तक

– विजय मुहूर्त: 02:15 PM से 03:00 PM तक

– प्रदोष काल: 06:00 PM से 07:30 PM तक

इन शुभ मुहूर्तों में देवी कालरात्रि की पूजा करने से साधक को विशेष फल की प्राप्ति होती है। यह समय देवी की कृपा प्राप्त करने और अपने जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाने के लिए अत्यंत उपयुक्त होता है।

इस दिन का रंग: नीला

नवरात्रि के सातवें दिन

 का रंग नीला माना जाता है। नीला रंग शांति, धैर्य, और गहराई का प्रतीक है। यह रंग देवी कालरात्रि के सौम्य और गंभीर स्वरूप को दर्शाता है। इस दिन भक्तों को नीले रंग के वस्त्र धारण कर देवी की पूजा करनी चाहिए, जिससे उन्हें देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

देवी कालरात्रि की आराधना से प्राप्त होने वाले लाभ

– भय से मुक्ति: देवी कालरात्रि की पूजा से साधक के जीवन से सभी प्रकार का भय और नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है।

– नकारात्मक शक्तियों का नाश: देवी कालरात्रि की कृपा से साधक के जीवन में उपस्थित सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों और अवरोधों का नाश होता है।

– आत्मिक उन्नति: देवी की पूजा से साधक को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है, जिससे वह अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है।

– धैर्य और साहस: देवी कालरात्रि की आराधना से भक्तों को जीवन में धैर्य और साहस प्राप्त होता है, जिससे वे अपने जीवन की सभी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।

निष्कर्ष

नवरात्रि का सातवां दिन देवी कालरात्रि की आराधना का दिन है, जो साधकों के जीवन से भय, अज्ञानता, और नकारात्मकता को दूर करती हैं। उनके पूजा से भक्तों को आत्मिक बल, मानसिक शांति, और जीवन में सफल

X
Book an appointment @ ₹199
Book an Appointment @ ₹199